मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा: आस्था, विज्ञान और संस्कृति का अनोखा संगम

मकर संक्रांति भारत के प्रमुख पर्वों में से एक है, जिसे सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के अवसर पर मनाया जाता है। यह पर्व हर वर्ष 14 या 15 जनवरी को आता है और इसके साथ ही देशभर में उल्लास, दान-पुण्य और उत्सवों की शुरुआत होती है। मकर संक्रांति की सबसे खास पहचान है—पतंग उड़ाने की परंपरा। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस दिन ही पतंग क्यों उड़ाई जाती हैं? इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ वैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारण भी जुड़े हैं।


धार्मिक मान्यताएं और आस्था


हिंदू धर्म में मकर संक्रांति को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि इस दिन सूर्य उत्तरायण होते हैं, यानी दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर गति करते हैं। उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा गया है, इसलिए इस समय किए गए शुभ कार्यों का फल कई गुना बढ़ जाता है। धार्मिक दृष्टि से पतंग उड़ाना सूर्य देव को नमन करने का प्रतीक माना जाता है। खुले आकाश में पतंग उड़ाकर लोग सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और अच्छी फसल, स्वास्थ्य व समृद्धि की कामना करते हैं।


वैज्ञानिक दृष्टिकोण


मकर संक्रांति के समय मौसम में बदलाव होता है। सर्दी धीरे-धीरे कम होने लगती है और धूप तेज हो जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस समय सूर्य की किरणों में विटामिन-डी प्रचुर मात्रा में मिलता है, जो शरीर के लिए बेहद लाभकारी है। पतंग उड़ाने के दौरान लोग छतों पर या खुले मैदानों में धूप में रहते हैं, जिससे शरीर को प्राकृतिक रूप से ऊर्जा और रोग प्रतिरोधक क्षमता मिलती है। इस तरह यह परंपरा अनजाने में ही स्वास्थ्य से भी जुड़ गई।


सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व


पतंगबाजी केवल एक खेल नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-जोल का माध्यम भी है। मकर संक्रांति के दिन परिवार, दोस्त और पड़ोसी एक साथ छतों पर इकट्ठा होते हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग

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