देवरिया। जनपद के विकासखंड देवरिया और बैतालपुर के मध्य ग्राम खोराराम और बढ़ाया बुजुर्ग के शिवान के बीच बनी पुरानी पुलिया पिछले आठ वर्षों से जर्जर पड़ी है। पुलिया टूट जाने के बाद से अब तक इसका निर्माण नहीं कराया गया, जिसके कारण लगभग 50 गांवों की जनता परेशानियों से जूझ रही है। लंबे समय से इस समस्या का समाधान न होने पर ग्रामीणों का धैर्य जवाब दे चुका है और उन्होंने आगामी चुनाव में मतदान का बहिष्कार करने का ऐलान कर दिया है।

ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दिनों में उनकी परेशानियां और भी अधिक बढ़ जाती हैं। पुलिया टूट जाने के कारण उन्हें गांव से बाजार या स्कूल जाने के लिए पांच किलोमीटर लंबा चक्कर लगाना पड़ता है। बच्चों को समय से स्कूल भेजना मुश्किल हो जाता है, वहीं बीमार लोगों को अस्पताल ले जाना भी बड़ी चुनौती बन जाता है। महिलाएं और बुजुर्ग तो इस रास्ते की दुर्दशा से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
गांव वालों ने बताया कि पुलिया टूटने के बाद से उन्होंने कई बार स्थानीय प्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर जिला अधिकारी श्रीमती दिव्या मित्तल तक को ज्ञापन सौंपे। बार-बार आश्वासन मिलने के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीणों का आरोप है कि नेताओं को चुनाव के समय उनकी याद आती है, लेकिन समस्या समाधान की बात आते ही सभी चुप्पी साध लेते हैं।
इसी उपेक्षा और लापरवाही से आक्रोशित होकर सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण पुलिया स्थल पर इकट्ठा हुए। उन्होंने एकजुट होकर प्रशासन और सरकार को कड़ी चेतावनी दी कि जब तक पुलिया का निर्माण नहीं कराया जाएगा, वे मतदान प्रक्रिया से दूरी बनाए रखेंगे। ग्रामीणों ने कहा कि उनका वोट तभी सार्थक है, जब उनकी मूलभूत समस्याओं का समाधान हो।
ग्रामीणों की यह नाराजगी अब प्रशासन और नेताओं के लिए एक बड़ा संकेत है। यदि जल्द ही इस पर ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इसका सीधा असर आने वाले चुनावी परिणामों पर भी देखने को मिल सकता है। गांव के लोगों का कहना है कि वे अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि वास्तविक कार्यवाही चाहते हैं।
गौरतलब है कि यह पुलिया न केवल खोराराम और बढ़ाया बुजुर्ग गांवों के लिए जरूरी है, बल्कि आसपास के लगभग 50 गांवों की जीवन रेखा मानी जाती है। यही कारण है कि इसके निर्माण में देरी सीधे तौर पर हजारों लोगों को प्रभावित कर रही है। किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने में कठिनाई होती है और बरसात में तो हालात और भी बदतर हो जाते हैं।
ग्रामीणों की यह लड़ाई अब सिर्फ एक पुलिया की मांग भर नहीं रही, बल्कि यह उनके आत्मसम्मान और अधिकार की लड़ाई भी बन गई है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन कब जागता है और खोराराम-बढ़ाया बुजुर्ग के बीच की यह पुलिया आखिर कब बनती है। फिलहाल, ग्रामीणों का गुस्सा चरम पर है और वे अपने फैसले पर अडिग दिखाई दे रहे हैं।